मंगलवार, मार्च 10, 2009

पक्षियों की मानव के प्रति संवेदना

सनातन धर्म और उससे संबधित जैन,बौओद्ध,सिक्ख धर्मों ने अहिंसा और करुना का संदेश दिया है.वह कितना महत्त्व पूर्ण है इस बात से मालूम होता है की पशु,पक्षी इसलिए करुना के पात्र नाहीं हैं की वे पर्यावरण चक्र को संतुलित करतें हैं बल्कि वे मानव की संवेदना को समझतें भी हैं।
गावों मैं देखा गया है की किसी परिवार मैं अमंगल घटना घटित हो जाने पर पालतू गाय ,बैल,कुत्ता २;३ दिन दाना पानी छोड़ देतें हैं.ये तो आम हैं.किंतु कोई बीमार हो जे और पालतू पक्षी उसकी पीड़ा को अनुभव कर .हल बतावें यह अजूबा देखने को मिला है,मेर्रिलंद मैं.मेर्र्य्लेंद के एक श्र्रेमन ब्रायन विल्सन नाम के आदमी को एक दुर्घटना मैं घाटक rउप से लगी। और उनका बोलना बंद होगया। ब्रायन के घर मैं पालतू तोता मैना थे। ये महाशय उनके सामने बैठ जाते.बस तोता मैना उनसे बात करते। बतियते.हर रोज यही क्रम .एक दिन अचानक ब्रायन के मुह से एक शब्द फुटा,दूसरा फुटा तीसरा फुटा और वे बोलने लग गए। अब उनके घर मैं ८० परिंदे है। धन्य हैं हमारे सनातन धर्म ,जैन बौद्ध और सिक्ख धर्मों के महँ गुरुओं की एक लम्बी श्रंखला ,जिसने करुना की देशना दी है.

रविवार, दिसंबर 07, 2008

kutoon ke sath bharteey nahee balki neta कुत्तों के संग भारतीय जनता नही ,बल्कि नेता ////////

कुत्तों के संग भारतीय जनता नही ,बल्कि नेता ////////बापू दक्षिणी अफ्रीका मैं रेल से यात्रा करते समय धकेल दिए गए थे .भारतीयों और कुत्तों को रेल की उस विशेष श्रेणी मैं यात्रा की अनुमति नही थी. अब आजादी के ६० साल बाद हालत बदली है.कुत्ते तो वहीं हैं.रेल की जगह रेल्ली है ,और जनता की जगह नेता हैं/यह घटना हुई है ,मुंबई मैं /आतंकवाद के खिलाफ निकली रैली मैं एक पोस्टर पर लिखा था ""इस रैली मैं कुत्तों और नेताओं को आने की अनुमति नही है.नेताओं अब चेतो/जनता ४० किलो का हार भी पहिनाती है ,और वही जनता जूतों की माला भी पहिना सकती है.

ham uttardayee gauohatya ke .aur poojen devon ko उत्तरदायी गौओ हत्या के ,और पूजें हम देवों को ------------

उत्तरदायी गौओ हत्या के ,और पूजें हम देवों को ------------
आजकल मूर्तियाँ ,गाय की हड्डियों से निर्मित होने लगी हैं.यह वस्तिकता प्रकाश मैं लाई हैं प्रसिद्द पशुप्रेमी और पर्यावरणविद मेनकाजी गाँधी.आम,सत्ता सुख भोगनेवाले नेताओं से अलग हस्ती मेनकाजी का कहना है की आकर्षक मूर्तियाँ बने ,इसके लिए स्वस्थ गायों को कत्लखानों में भेजकर ,हड्डियाँ निकलकर ,शोधन के लिए भेजी जातीं हैं.और राम,दुर्गा,कृषण की मूर्तियाँ बनाकर बेचीं जाती हैं.बिकरी मैं इजाफा तब होता है,जब नवरात्री,रामनवमी आदि उत्सव आते हैं.उत्पादकों का कहना है की ये हड्डियाँ गाय की नही बल्कि ऊंट की हैं/क्या तर्क है?अव्वल तो हड्डियों से मूर्तियाँ बने ही क्यों?मेनकाजी का कहना है की देश मैं ऊँटों की इतनी आबादी ही नही है की इतनी मात्र मैं मूर्तियाँ बन सके.मई शंकराचार्यों.,प्रवचनकारों से हाथ जोड़कर निवेदन करता हूँ की भोलीभाली जनता को इस प्रकार की मूर्तियों की पूजा करने से रोकने की सीख देन/

गुरुवार, नवंबर 27, 2008

माँ की गोद मैं शिशु खुश .पौधों पर फूल खुश घर मैं लगे गुलाब पर ४-५ फूल विकसीत हुए .मेरी पत्नी की सहेली ने भगवन पर चढाने के लिए पत्नी से फूल मांगे. पत्नी ने तत्काल मना कर दिया.मैंने कहा की अगर १-२ फूल दे देतीं तो क्या होजाता?पत्नी बोली की मैं रोज इन पौधों को निकटता से देखती हूँ.जिस प्रकार शिशु अपनी माँ की गोद मैं प्रस्सन रहता है उसी प्रकार फूल पौधे पर प्रस्सन रहतें हैं.जब बड़ी देर तक शिशु माँ की गोद से अलग होता है तो माँ और शिशु दोनों बैचेन हो जातें हैं.इसी प्रकार फूल को पौधों से अलग करने पर फूल और पौधे दोनों बैचेन हो जातें हैं.शास्त्र कहतें हैं की हम प्रकृति के विर्रुधकोई काम न करें .मुझे इस बात की कल्पना भी नही थी की पौधों को बड़ा कर ,उनकी सेवा कर अपने आप ऐसी संवेदना उत्पन्न हो जातीं हैं

रविवार, नवंबर 16, 2008

MEEDIA KA MASKHARAPAN

मीडिया का मसखरापन
मीडिया का उद्देश जनता से संवाद स्थाप्पित कर उसकी भावनाओं को प्रदशित करना है .लेकिन मीडिया की गत दिनों बानगी देखी .एक महिला के साथ सामूहिक बलात्कार हुआ .मीडिया कर्मी पहुंचे.महिला गंभीर ,दुखी संवेदनाओं से ग्रस्त,शर्म से मर रही ,मीडिया मर्द पूछता है ""आपको सामूहिक बलात्कार के बाद कैसा लगा""महिला शर्म सार.क्या कहे मीडिया कर्मी के सवालों पर गुस्सा करे या उसे नोच डाले?अभी अभी मीडिया ने बाल कलाकार दर्शील सफारी का आत्मविशवास डिगा .दिया.उससे सवाल किया गया की ""प्रियंका चौपडा बिकनी मैं कैसी लगती है""? आप अपने पिताजी से आधिक कमातें हैं तो आपको कैसा लगता है ''? अब यह बल्कलाकर दर्शील जो पाहिले आत्मविशवास से भरा था ,मुखर था अब उतना मुखर नही रहा. मीडिया से दूर रहने लगा? यह मीडिया का मसखरापन है या रचना धर्मिता है?
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naya shabd ""hindu aatankvad""

शास्त्रों मैं आतकवादी समूहों के नामकरण ;""असुर"",""दानव "",""राक्षस"" किए गए हैं.इन पुरातन आतंकवादियों को उनके धरम के आधार पर नामांकित नही किया जाता था.आजकल इस्लामिक आतंकवादी,सिक्ख आतकवादी ,तो तो नामकरण होही गए है.अब नया शब्द ""हिंदू आतंकवादी"" मनो आतंकवादी बन्ने और नम पड़ने की होड़ चल रही हो. क्यों इन्हे इनके धर्म के आधार पर नामांकित किया जाय ?हिंदू,मुस्लमान,सिक्खों की आबादी मैं से इन आतंकवादियों का %कितना है?२%भी नही.फिर इन मुट्ठी भर आतकवादियों के पीछे पुरी कॉम का नामकरण आतंकवादियों के नम से क्यों किया जाय?और ये आतंकवादी युवा किसी बड़े राजनेता,अम्मर या उद्योगपति के पुत्र नही हैं/बल्कि इनकी कोमल भावनाओं को परिवर्तित कर मोड़ दिया गया है.इन युवाओं मैं से अधिकतर बेरोजगार,गरीब,अभावों से ग्रस्त हैं.जरूरत इस बात की है की इन्हे जीवन जीने की सुविधाओं से रूबरू कराया जाय .शिक्षा दी जाय. इन्हे उन्नत और प्रगतिशील जीवन का परिचय कराया जाय/ कॉम के शब्दों से इनका लेबलिंग कदापि न किया जाय

रविवार, नवंबर 09, 2008

ऐश की ग्यारंटी तो है

रेल खिड़की पर तिकिथार्थियों के कतारें यात्रा का महत्व है। सिनेमा खिड़की पर तिकिथार्थियों के कतारें पिक्चर का महत्व है।

दूध देरी की दुकान पर कूपन लिए लोगों की कतारें बिकनेवाले दूध का महत्व है। तौहरों पर बाजारों मैं लगी कतारें तौहरों का महत्व है।

दिल्ली और प्रान्तों की राजधानियों मैं तिकिथार्थियों की कतारें ,विधायक पद का महत्व है।

रेल मैं चढाने पर सिट की ग्यारंटी नही मगर पहुँच जाने की ग्यारंटी तो है।

सिनेमा हल मैं हवा ,पंखे की ग्यारंटी तो नही मगर पिक्चर की ग्यारंटी तो है

दूध देरी पर धक्के मुक्के की ग्यारंटी तो नही मगर दूध की ग्यारंटी तो है

टिकट विधायक का मिल जाने पर ,जीत की ग्यारंटी तो नही ,मगर जीत जो गए ,

तो ऐश की ग्यारंटी तो है/ऐश की ग्यारंटी तो है/